Tuesday, April 26, 2011

एक गीत


ओह रे, रुपहले पन्छी, पास हमारे स्वर नही है,
उड. सकु आकाश मे, ऐसा तो कोई वर नही है।
लेखनी कि नोक पर, वर दे कि उतरे गीत तेरे,
स्वपन सरिता मे बहुं, संग,संग ऐ मीत मेरे॥
विरह हो मेरे दुर, ऐसी प्रेम कि तस्वीर खिचु,
और पत्थर ह्रिदय पिघले कि उससे नीर सीचु॥
तेरे हर पल-पल की वेदना मै ले सका तो,
एक पल के लिये भी, संन्तावना मै दे सक तो।
तो सफ़ल यह रात, यह तारो तरंगो की रवानी,
वायु की हलचल, मेरे मन की कहानी,
तो सफ़ल यह गीत मेरा, और
सफ़ल असित्त्व मेरा।
जा रहा हुं, स्वर भरो तुम,
मै फिर लिखुगा गीत तेरा॥
                                           मिथिलेश राय

No comments:

Post a Comment