मैने देखी एक तस्वीर, जिसके होठ फ़ैले थे,
मुझे यकिन है, वो मुस्कुराहट नही थी।
वो आखें फाड.-फाड. कर देख रहा था,
किसी कब्र मे दबे लाश की तरह,
उनको जो उसके मजारं पर आये थे,
फुलो को चढाने के लिए,
उसके आखों से आसुं टपक रहे थे,
मुझे यकिन है, वो गम के नही, खुशी के आसुं थे,
क्युकि वह खुश था, किसी ने मेरी तस्वीर से तो प्यार किया।
उसने अपने कपडॆ. उतार दिये थे, मगर
मुझे यकिन है, वह नंगा नही था,
उसने ढक लिया था अपने बदन को,
किसी के यादो के साये से,
कभी कभी वक्त के चुहे साये को काट देते थे,
फिर भी उसे वह सिल लेता था, प्यार के धागों से,
वह बैठा है एकान्त मे मगर,
मुझे यकिन है, उसके दिल कि यादो मे बन्द है,
ढेर सारे सुख-दुख, किसी की आह, किसी की चाह,
किसी का सुन्दर रुप, किसी की शोख अदायें,
निःसन्देह वह अकेला नही था,
मगर बैठा जरुर था, किसी तख्त पर कुहनी टिकाये,
मुझे यकीन है, वह बैठा नही है,
उसका मन है अशान्त, वह सर्प सा ऎठ्ता था
अपने बदन को रह-रह कर,
उसके बांह फैले थे, किसी को अपने आगोश मे भरने को,
मगर वो नही आयी जो उसके मजार तक आयी थी,
सिर्फ़ फुलो को चढाने के लिये,
मुझे यकीन है, वह कोई तस्वीर नही था,
एक धुधला सा आईना था,
जिसमे मेरी परर्छाइया उभर आयी थी।
मिथिलेश राय
मुझे यकिन है, वो मुस्कुराहट नही थी।
वो आखें फाड.-फाड. कर देख रहा था,
किसी कब्र मे दबे लाश की तरह,
उनको जो उसके मजारं पर आये थे,
फुलो को चढाने के लिए,
उसके आखों से आसुं टपक रहे थे,
मुझे यकिन है, वो गम के नही, खुशी के आसुं थे,
क्युकि वह खुश था, किसी ने मेरी तस्वीर से तो प्यार किया।
उसने अपने कपडॆ. उतार दिये थे, मगर
मुझे यकिन है, वह नंगा नही था,
उसने ढक लिया था अपने बदन को,
किसी के यादो के साये से,
कभी कभी वक्त के चुहे साये को काट देते थे,
फिर भी उसे वह सिल लेता था, प्यार के धागों से,
वह बैठा है एकान्त मे मगर,
मुझे यकिन है, उसके दिल कि यादो मे बन्द है,
ढेर सारे सुख-दुख, किसी की आह, किसी की चाह,
किसी का सुन्दर रुप, किसी की शोख अदायें,
निःसन्देह वह अकेला नही था,
मगर बैठा जरुर था, किसी तख्त पर कुहनी टिकाये,
मुझे यकीन है, वह बैठा नही है,
उसका मन है अशान्त, वह सर्प सा ऎठ्ता था
अपने बदन को रह-रह कर,
उसके बांह फैले थे, किसी को अपने आगोश मे भरने को,
मगर वो नही आयी जो उसके मजार तक आयी थी,
सिर्फ़ फुलो को चढाने के लिये,
मुझे यकीन है, वह कोई तस्वीर नही था,
एक धुधला सा आईना था,
जिसमे मेरी परर्छाइया उभर आयी थी।
मिथिलेश राय
No comments:
Post a Comment