मै अर्द्धसत्य के लिये नही,
पुर्णसत्य के लिये प्रयासरत हू।
मै सहज भाव से तुम्हे,
स्वीकार करना चाह्ता हु,
सम्पुर्ण जीवन के लिये।
यह मत सोचो कि,
हमारी सीमाए क्या है,
सीमा स्वंय तुम हो,
तुम्हे पार करनी होगी सीमा रेखा,
मै तुम्हे आत्मसात करने को,
सहज तैयार हुं, क्युकि,
मै प्रक्रिति हु, सहजता मेरी नियती है,
दान मेरा धर्म, आत्मसात करना
मेरा कर्म है।
यह चिन्तन शाश्वत है,
इतिहास पर गौर करो,
हर युग मे ऐसा होता है,
और होता भी रहेगा।
शक्ती का पराक्रम, काल की मर्यादा,
धन का वैभव, सौन्दर्य का बोध,
समयबद्ध है, परन्तु इतिहास लिखे
जाते है, इन विषयो पर,
शालीनता जो तुम्हारे अन्दर है,
उसे सौन्दर्य से जोडो,
शक्ती जो निहीत है तुम्हारे अन्दर,
उसे प्रेम से जोडो,
जीवन सरस हो जायेगा।
अर्थ के आभाव मे कही भटक न जाना,
मै वही कह रहा हु, जो तुम समझ रहे हो,
सदीयो से समझते आये हो।
मिथिलेश राय
पुर्णसत्य के लिये प्रयासरत हू।
मै सहज भाव से तुम्हे,
स्वीकार करना चाह्ता हु,
सम्पुर्ण जीवन के लिये।
यह मत सोचो कि,
हमारी सीमाए क्या है,
सीमा स्वंय तुम हो,
तुम्हे पार करनी होगी सीमा रेखा,
मै तुम्हे आत्मसात करने को,
सहज तैयार हुं, क्युकि,
मै प्रक्रिति हु, सहजता मेरी नियती है,
दान मेरा धर्म, आत्मसात करना
मेरा कर्म है।
यह चिन्तन शाश्वत है,
इतिहास पर गौर करो,
हर युग मे ऐसा होता है,
और होता भी रहेगा।
शक्ती का पराक्रम, काल की मर्यादा,
धन का वैभव, सौन्दर्य का बोध,
समयबद्ध है, परन्तु इतिहास लिखे
जाते है, इन विषयो पर,
शालीनता जो तुम्हारे अन्दर है,
उसे सौन्दर्य से जोडो,
शक्ती जो निहीत है तुम्हारे अन्दर,
उसे प्रेम से जोडो,
जीवन सरस हो जायेगा।
अर्थ के आभाव मे कही भटक न जाना,
मै वही कह रहा हु, जो तुम समझ रहे हो,
सदीयो से समझते आये हो।
मिथिलेश राय
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