मेरी तन्हाईओ का साथी आईना,
जिसमे मै अपना चेहरा देखता था,
आज मेरे ही हाथो टूट गया।
टुट्ना तो शायद नियति है,
मगर इस तरह, जैसे अन्नत हीन आकाश से कोई तारा,
खुद अपनी ही आग मे जलता हुआ,
और मन्जिल तक पहुच कर खाक हो गया।
मेरी तन्हाईओ का साथी आईना,
जिसमे मै अपना श्रीगार करता था,
आज मेरे ही हाथो छुट गया।
छुटना तो शायद बन्धन का आभास है, मगर इस तरह, जैसे मां के ग्रभ
से नवजात शिशु,
स्वयं तो स्वतंत्र हो गया, मगर पसीने से लथपथ,
मां की पीडा बेकार हो गयी।
वो बन्धन जो महीनों से एकाकार थी,
कभी बधं पाती है, जीवन पर्यन्त?
पहले तन्हाई, फिर तालाश, साथी, फिर मिलना और बिछडना,
न जाने विधाता का, ये कैसा शणयत्रं है।
मिथिलेश राय
जिसमे मै अपना चेहरा देखता था,
आज मेरे ही हाथो टूट गया।
टुट्ना तो शायद नियति है,
मगर इस तरह, जैसे अन्नत हीन आकाश से कोई तारा,
खुद अपनी ही आग मे जलता हुआ,
और मन्जिल तक पहुच कर खाक हो गया।
मेरी तन्हाईओ का साथी आईना,
जिसमे मै अपना श्रीगार करता था,
आज मेरे ही हाथो छुट गया।
छुटना तो शायद बन्धन का आभास है, मगर इस तरह, जैसे मां के ग्रभ
से नवजात शिशु,
स्वयं तो स्वतंत्र हो गया, मगर पसीने से लथपथ,
मां की पीडा बेकार हो गयी।
वो बन्धन जो महीनों से एकाकार थी,
कभी बधं पाती है, जीवन पर्यन्त?
पहले तन्हाई, फिर तालाश, साथी, फिर मिलना और बिछडना,
न जाने विधाता का, ये कैसा शणयत्रं है।
मिथिलेश राय
hame pyara lagta hai
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