Tuesday, May 3, 2011

प्रेम पथिक


तेरे चेहरे पर उभरते रहे, 
अहंकार और घृणा से भरे भाव,
मै आइना नहीं हु वरना ,
दिखा देता तेरा असली रूप|
तू मेरे व्यथित रूप को,
कभी देख नहीं सकते हो, 
क्युकि तेरे अन्तरम में,
ठहरा हुआ है एक अक्श,
किसी के हँसते चेहरे का,
वक़्त कभी बेपर्दा कर देगा,
उस अक्श की असलियत को,
मगर तब तक तुम खो चुके होगे,
उस वृक्ष की छाया को जो,
तुम्हे अनजाने में प्रेम पथिक,
समझकर अपनी बाँहों का,
सहारा देना चाहता था|
भूल का जब तुम्हे, एहसास होगा,
तुम खुद जाकर देखना,
वो वृक्ष भी वही होगा शाश्वत,
उसकी छाया भी होगी मगर,
कोई और प्रेम पथिक 
उसकी बाँहों में समाया होगा|
                                                मिथिलेश राय

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