धत तोरी के! ये क्या हो गया?
बात दिल में थी मेरे, होठों से बयाँ हो गया|
धत तोरी के! ये क्या हो गया?
दर्दे दिल मै सह भी लेता,
अगर ये बात न होती,
उनकी बिंदिया ना चमकती,
तो ये हालात न होती,
उनके पायल न खनकते,
तो ये जज्बात न होती,
वो यूँ महफ़िल से न जाते,
उजाले यूँ ही रहते, रात न होती|
मैंने हौले से उनको रुकने को भी कहा था,
उनके चेहरे पे शरमो-हया हो गया,
बात दिल में थी मेरे, होठों से बया हो गया|
धत तोरी के! ये क्या हो गया?
अब दामन बचने से क्या फायदा,
औरो के घर जाने से क्या फायदा,
तुम कुछ कहो न कहो, नजरे कह देगी,
आईने से लजाने से क्या फायदा|
उस किनारे पे जाने की जिद्द में,
दरिया में डूब जाने से क्या फायदा |
मैं कुछ ना कहुगा, चुप ही रहूगा,
सोचा था मगर, न जाने कैसे ये वाकया हो गया|
बात दिल में थी मेरे, होठों से बया हो गया|
धत तोरी के! ये क्या हो गया?
मिथिलेश राय
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